सोचा ना था

सोचा था हमसफ़र हो, रहगुज़र के तुम, दर्द-ए-दिल का सबब बन जाओगे, सोचा ना था| सोचा था उमर गुज़रेगी कहकशन में अपनी, बाम-ए-फलक मे अब्र बन जाओगे, सोचा न था| जिसकी सूरत बसी थी निगाहो में मेरी, उसे यु दूर छोड़ आऊंगा, सोचा न था| अब जो जा चुके हो तुम, तुम्हे याद करना भूल... Continue Reading →

चलो अब विदा लेते हैं

डोर अगर कच्ची है, तो पकडे रहना जरूरी है क्या ? होठों पे अगर सिसकी और आँखों में नमी है, तो उनसे जुड़े रहना जरूरी है क्या ? आखिर कब तक उनकी दहलीज पर दस्तक देंगे ? हर बार यदि दरवाजा बंद है, तो सोचा मंजिल जरूरी है क्या ? कहो कब तक ख्यालों में... Continue Reading →

आशा है अब किसी को ऐतराज़ न हो…

अब जा कर शायद सवालों की बौछार न हो,
साथी को अपनाने में जेल की दीवार न हो,
शर्म से अब झुके न कभी उनकी वो आँखे,
अधिकार है उनका चयन करना,
आशा है अब किसी को ऐतराज़ न हो|

पैरों की बेड़ियाँ टूट चुकी है, आज मन की बेड़ियाँ तोड़ते है|

पैरों की बेड़ियाँ कब के टूट चुकी है,

चलो मन की बेड़ियाँ तोड़ते है|

झिझक को थोड़ा विराम देते है,

और हर लक्ष्मण रेखा पार करते है|

अब लोग क्या सोचेंगे भूल जाते है,

और सपनो की उड़ान भरते है|...

Do it write now!

चलो आज हड़बड़ी छोड़ देते है,

डर से इसी क्षण नाता तोड़ देते है,

जो सोचा है कई बरसो से करने का,

उससे इसी पल शुरू कर देते है...

Army behind the Army – Army Wives

ये वो मोहब्बत नहीं,

जिसे सड़कों के फासले मिटा दे,

जो खत्म होने पर दुआओं से उसका नाम हटा दे,

जो साँसों की डोर के टूटने से घबरा जाए,

जो दूरी को मजबूरी बता जाए|

याद आएंगे वो चार साल…

याद आयेगा वो पहला साल,

जब पहली बेंच पर बैठा करते थे,

रजनीश सर से डरा करते थे और ढंग से कॉपियां भरा करते थे,

हर लेक्चर के बाद वाशरूम की और भागा करते थे,

भारी भरकम बैग लेकर सुबह सुबह थर्ड फ्लोर पर हांफा करते थे...

वो तो है पहाड़ो की रहने वाली…

वो इन तंग गलियों की नहीं,

सीधी समतल इन सड़कों की नहीं,

इमारतों से ढकी इन शहरों की नहीं,

धूल भरी हवा के लहरो की नहीं...

अब जाने दो उसे…

बहुत हुई रिश्तों की खींचा तानी,

अब सांसों को भी घुटन महसूस होती है|

जिन्हे उड़ना था खुले आसमान में पंख फैला कर,

उन्हें संकीर्ण सोच की रस्सियां जकड़ी हुई है|

आखिर कब तक कोई आंधी को नियंत्रित करेगा

अब जाने दो उसे, वो अपनी मंजिल खुद तय करेगा !!!

तू वो आग है जो कभी बुझती नहीं…

तू लहरों की तरह कभी रूकती नहीं,

हिमालय की तरह कभी झुकती नहीं |

तेरे चेहरे की मासूमियत, पत्थर को पिघला दे,

तू वो आग है जो कभी बुझती नहीं |

तू गुजरती है जिन मंजरो से मुस्कुरा के,

उन वादियों में नगमों की सौगात लाती है |

तू वो लम्हा है पलकों पे रख के जिसे,

होठों पर खुशियों की बरसात आती है |

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